*मुक्त-मुक्तक : 236 - जानता हूँ ये..........

जानता हूँ ये कि वो निश्चित ही कुछ पथभ्रष्ट है ॥
थोड़ी उच्छृंखल है और थोड़ी बहुत वह धृष्ट है ॥
इतने सब के बाद भी उस पर मेरा पागल हृदय ,
घोर अचरज.... तीव्रता से हो रहा आकृष्ट है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Anonymous said…
Hi there colleagues, its impressive paragraph about cultureand fully explained, keep it up all the time.


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