*मुक्त-मुक्तक : 235 - जितना चाहूँ मैं.........

जितना चाहूँ मैं रहे चुप वो और भी बमके ॥
बर्क़े याद अब तो साफ़ आस्माँ में भी चमके ॥
रेल के तेज़ गुज़रने पे पुराने पुल सा ,
उससे मिलने को तड़प धाड़ धाड़ दिल धमके ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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