*मुक्त-मुक्तक : 234 सँकरी गलियों को..............

सँकरी गलियों को गली चौड़ी सड़क को मैं सड़क ॥
क्यों लिखूँ न सच को ज्यों का त्यों बताऊँ बेधड़क ॥
भूले जो काने को काना कह दिया था इक दफा ,
अपने दुश्मन हो गए थे ग़ैर पढ़ उट्ठे भड़क ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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