*मुक्त-मुक्तक : 230 - कभी भूले जो...............


कभी भूले जो मेरे साथ तू 
तनहा सफ़र करता ॥
भले दो डग या मीलों मील का 
लंबा सफ़र करता ॥
क़सम से सुर्ख़ अंगारों पे 
तलवारों पे भी चलते ,
मुझे महसूस होता था 
मैं जन्नत का सफ़र करता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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