*मुक्त-मुक्तक : 227 - निकट स्वादिष्ट...............


निकट स्वादिष्ट भोजन के भी 
उपवासा रखा हमको ॥
विकट दुर्भाग्य ने बरसात में
 प्यासा रखा हमको ॥
कभी भर दोपहर में 
जेठ की रेती पे नंगे पग ,
अहर्निश बर्फ पे कई पूस 
नागा सा रखा हमको ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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