*मुक्त-मुक्तक : 225 - उजड़े हुए चमन..............


उजड़े हुए 
चमन की तरह आजकल हूँ मैं ॥
सस्ते घिसे 
कफ़न की तरह आजकल हूँ मैं ॥
हालत पे अपनी 
ख़ुद ही मैं भी शर्मसार हूँ ,
इक कुचले 
नाग फन की तरह आजकल हूँ मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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