*मुक्त-मुक्तक : 220 - क़ुराने पाक़................

क़ुराने पाक़ ओगीता की क़सम खाकर मैं कहता हूँ ॥
जहाँ तक मुझसे बन पड़ता है मैं चुपचाप रहता हूँ ॥
मगर इक हद मुक़र्रर है मेरे भी सब्र की जायज़ ,
न औरों पर सितम ढाऊँ न ख़ुद पर ज़ुल्म सहता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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