*मुक्त-मुक्तक : 215 - इसके सिवा न...............

इसके सिवा न और कोई पास था चारा ॥
तब तो लिया है एक खिलौने का सहारा ॥
दिल का गुबार और किस तरह निकालते ,
होता जो कान देके सुनने वाला हमारा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Ghanshyam kumar said…
बहुत सुन्दर...
Rajendra Kumar said…
बहुत ही अनमोल मुक्तक.
धन्यवाद ! Ghanshyam kumar जी !
धन्यवाद ! Rajendra Kumar जी !

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