*मुक्त-मुक्तक : 203 - हँस हँस के.................

हँस हँस के उसने कितनी बार आँख चार की ॥
चाबी मगर न भूलकर दी दिल के द्वार की ॥
माँगा तो उसने तोहफ़े में कुछ भी नहीं था ,
ख़ुद हमने ज़िंदगानी उसके नाम यार की ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Sriram Roy said…
lovely...................
Rajendra Kumar said…
आपके मुक्तक बहुत ही मनमोहक होते हैं.यदि आप ब्लॉग पर लेबल वाला गजेट लगा लेते तो सारे मुक्तक एक साथ पढ़ने को मिल जाते.
धन्यवाद ! Rejendra Kumar जी !

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