*मुक्त-मुक्तक : 201 - कभी दिल में................


कभी दिल में हमें उनके 
ठिकाना रोज़ मिलता था ॥
जगह तकियों की बाहों का 
सिरहाना रोज़ मिलता था ॥
इधर कुछ रोज़ से क्या 
हाथ अपना तंग हो बैठा ,
नहीं मिलता कभी अब वो 
जो जानाँ रोज़ मिलता था ॥
(जानाँ=महबूब ,प्रेमपात्र)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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