*मुक्त-मुक्तक : 198 - बाल न नोचता...............


बाल न नोचता न 
सर को धुना करता था ॥
मेरी बकवास भी वो 
दिल से सुना करता था ॥
जब न मिलती थी 
तवज्जोह कहीं से मुझको ,
इक वही था जो आके
मुझको गुना करता था ॥
(गुना=मानना, महत्व देना)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Sriram Roy said…
बहुत सुन्दर मुक्तक ....
बहुत अलग ..बहुत सुन्दर
धन्यवाद ! Vandana KL Grover जी !

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