88 : मुक्त-ग़ज़ल - मैं बेक़रार हूँ...............


मैं बेक़रार हूँ तुम मुझको क़रार दे दो ॥
नफ़रत तो सबने दी है तुम प्यार-व्यार दे दो ॥
 तमगे , इन्आम ये मेरा पेट न भर देंगे ,
गर हो सके तो मुझको इक रोज़गार दे दो ॥
चिल्लाते चीखते सब स्वर मेरे फट गए हैं ,
मेरे गले को सिलने वीणा के तार दे दो ॥
बच्चे भी बातों बातों में तानते बंदूकें ,
मुझको कलम बदल के चाकू कटार दे दो ॥
सूखे ये मिट्टी इससे ऐ बुततराश पहले ,
इन बिगड़ी मूरतों को सारे सुधार दे दो ॥
सुनकर जो मेरे पोशीदा ग़म का लुत्फ़ न ले ,
इक राज़दार ऐसा इक ग़मगुसार दे दो ॥
कुछ लोग शौक से भी लेते हैं क़र्ज़ तुमसे ,
मुझको ज़रूरतों की ख़ातिर उधार दे दो ॥
दीवार मत दो मुझको न खिड़की न दरवाज़ा ,
तुम मुझको इक अकेली छत उस्तुवार दे दो ॥
(उस्तुवार=स्थायी/दृढ़ ,बुततराश=मूर्तिकार ,पोशीदा=गुप्त,ग़मगुसार=हमदर्द)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


 

Comments

Rajendra Kumar said…
बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल की प्रस्तुति,आभार.
धन्यवाद ! Rajendra Kumar जी !

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