*मुक्त-मुक्तक : 194 - इतना मैं पिंजरे..........


इतना मैं पिंजरे में रहा
 कि भूल गया उड़ना ॥
कुछ दिन में शायद ऐसा हो 
भूल जाऊँ चलना ॥
जब सय्याद न बख़्शे 
इतने पर भी आज़ादी ,
सीख लिया मैंने भी 
बंधन में खुलकर रहना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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