*मुक्त-मुक्तक : 188 - दुश्मन भी हमसे..............


दुश्मन भी हमसे बनके
हमेशा सगा मिला ॥
हमको कभी वफ़ा न मिली 
बस दग़ा मिला ॥
जिस दिल को भी चुराने चले
शब-ए-स्याह हम ,
उस रोज़ 
सारी-सारी रात वो जगा मिला ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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aapke shabd hire ke samaan chamakte hain...............
बहुत बहुत धन्यवाद ! श्रीराम रॉय जी !

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