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Showing posts from May, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 236 - जानता हूँ ये..........

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जानता हूँ ये कि वो निश्चित ही कुछ पथभ्रष्ट है ॥ थोड़ी उच्छृंखल है और थोड़ी बहुत वह धृष्ट है ॥ इतने सब के बाद भी उस पर मेरा पागल हृदय , घोर अचरज.... तीव्रता से हो रहा आकृष्ट है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 235 - जितना चाहूँ मैं.........

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जितना चाहूँ मैं रहे चुप वो और भी बमके ॥ बर्क़े याद अब तो साफ़ आस्माँ में भी चमके ॥ रेल के तेज़ गुज़रने पे पुराने पुल सा , उससे मिलने को तड़प धाड़ धाड़ दिल धमके ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 234 सँकरी गलियों को..............

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सँकरी गलियों को गली चौड़ी सड़क को मैं सड़क ॥ क्यों लिखूँ न सच को ज्यों का त्यों बताऊँ बेधड़क ॥ भूले जो काने को काना कह दिया था इक दफा , अपने दुश्मन हो गए थे ग़ैर पढ़ उट्ठे भड़क ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 233 - हुस्न में वो............

हुस्न में वो पुर ग़ज़ब 
इंसान था ॥ उसका रब जैसा ही कुछ 
उनवान था ॥ शक्लोसूरत से तो
 मीठी झील था , फ़ितरतोसीरत से 
रेगिस्तान था ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 232 - आज कच्चे ही.............

आज कच्चे ही सभी 
पकने लगे हैं ॥ इसलिए जल्दी ही सब
थकने लगे हैं ॥ अपने छोटे छोटे 
कामों को भी छोटे- छोटे भी नौकर 
बड़े रखने लगे हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

92 : मुक्त-ग़ज़ल - मछलियों केकड़ों..........

मछलियों केकड़ों कछुओं का काल लगता है ॥ मुझको चारा नहीं वो शख़्स जाल लगता है ॥ घाघ है दुष्ट है शैतान से न कुछ कम पर , शक्ल-ओ-सूरत से नौजवाँ वो बाल लगता है ॥ ध्यान करता है जब भी मुझको कोई साधु नहीं , वो कभी बगुला कभी इक विडाल लगता है ॥ तुम तो आए हो हथेली पे जमाने सरसों , पल में कैसे करें की जिसमें साल लगता है ॥ जो लुटाने रहे आमादा प्यार भी अपना , वतन पे बस वही माई का लाल लगता है ॥  कौन है जिसने कभी उम्र भर गुनह न किया , मुझको इकदम ये फ़ालतू सवाल लगता है ॥ वक़्त पड़ने पे गाय ने भी खदेड़े हैं शेर , यों ये सुनने में अजीब और कमाल लगता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 231 - उम्र भर खाली..........

उम्र भर खाली रहा जो 
वक़्ते रुख़सत भर गया ॥ इक वो हैरतनाक उम्दा 
कारनामा कर गया ॥ जिससे बढ़कर दूसरा 
दुनिया में न खुदगर्ज़ था , बस जुनूँ में इक परायी 
जाँ बचाते मर गया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

91 : मुक्त-ग़ज़ल - कह के आने की................

कह  के आने की गया आता नहीं ॥ उसके बिन कोई मज़ा आता नहीं ॥ अपनी सच्चाई छिपा कर सब मिलें , उससा कोई भी खुला आता नहीं ॥ यों हमारे साथ वो हर वक़्त है , देखने में जो ख़ुदा आता नहीं ॥ कोई मजबूरी है यों खुद्दार तो , छोड़ कर शर्मो हया आता नहीं ॥ क्या हुई तुझसे ख़ता जल्दी बता , तू कभी सर को झुका आता नहीं ॥ हर मुसीबत के लिए तैयार रह , कह के कोई ज़लज़ला आता नहीं ॥ मंदिर औ’’मस्जिद जहाँ पग पग पे हों , रास्ते में मयकदा आता नहीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 230 - कभी भूले जो...............

कभी भूले जो मेरे साथ तू 
तनहा सफ़र करता ॥ भले दो डग या मीलों मील का 
लंबा सफ़र करता ॥ क़सम से सुर्ख़ अंगारों पे 
तलवारों पे भी चलते , मुझे महसूस होता था 
मैं जन्नत का सफ़र करता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 229 - दुपट्टे बिन न..............

दुपट्टे बिन न आगे ब्रह्मचारी  के तू आया कर ॥ विधुर के सामने यौवन को मत 
खुलकर दिखाया कर ॥ तू निःसन्देह सुंदर है ,
है आकर्षक बड़ी पर स्थिर- तलावों में न यों बारूद के
 गोले गिराया कर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 228 - मेघ की रोज़..........

मेघ की रोज़ मरुस्थल 
पुकार करता है ॥ किन्तु मेघ अपना जल 
नदी पे वार करता है ॥ मैंने पाया है जिनके पास 
प्रचुर धन-दौलत , उनपे चित लक्ष्मी ,
कुबेर प्यार करता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 227 - निकट स्वादिष्ट...............

निकट स्वादिष्ट भोजन के भी 
उपवासा रखा हमको ॥ विकट दुर्भाग्य ने बरसात में
 प्यासा रखा हमको ॥ कभी भर दोपहर में 
जेठ की रेती पे नंगे पग , अहर्निश बर्फ पे कई पूस 
नागा सा रखा हमको ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 226 - क़िस्म क़िस्म की..........

क़िस्म क़िस्म की नई नई वह 
साजिश रोज़ रचे ॥ मुझ पर क़ातिल घात लगाए
 कैसे जान बचे ॥ वो शमशीर कोई सुल्तानी 
मैं कछुए सी ढाल , बकरे की माँ कब तक ख़ैर 
मनाती फिरे नचे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 225 - उजड़े हुए चमन..............

उजड़े हुए 
चमन की तरह आजकल हूँ मैं ॥ सस्ते घिसे 
कफ़न की तरह आजकल हूँ मैं ॥ हालत पे अपनी 
ख़ुद ही मैं भी शर्मसार हूँ , इक कुचले 
नाग फन की तरह आजकल हूँ मैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 224 - कुछ निष्ठा कुछ.........

कुछ निष्ठा कुछ अथक परिश्रम
 पर आधृत पायीं ॥ कुछ बातें संयोग मात्र कुछ
 भाग्याश्रित पायीं ॥ गाह बिल्लियों के भागों 
ख़ुद छींके टूट गिरे , और कभी मुश्किल से 
चूहे कर अर्जित पायीं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 223 - बछड़े के लिए..........

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बछड़े के लिए कुछ तो दूध छोड़ दे कट्टर ॥ कितना दुहेगा रहम भी कर गाय के थन पर ॥ बिन दाँत के बछड़े को परोसे अभी से घास , दम है तो अपने दुधमुंहे के आगे रोटी धर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 222 - बादल भरी................

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बादल भरी दुपहरी में घनघोर हो गए ॥ बारिश हुई तो पेड़-पौधे मोर हो गए ॥ सूखे से हलाकान थे इंसान औ जानवर , होकर के तर-बतर मुदित विभोर हो गए ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

जो भी दुष्कृत्य करे..................

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जो भी दुष्कृत्य करे उसको मत माफ़ करो बस साफ़ करो ॥ चौराहे पर नंगा कर फाँसी देकर इंसाफ़ करो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 221 - पहले के ज़माने...........

पहले के ज़माने में तो 
घर घर थे कबूतर ॥ इंसानी डाकिये से भी 
बेहतर थे कबूतर ॥ इस दौर में वो ख़त-ओ-
किताबत नहीं रही , सब आशिक़ों पे ज़ाती 
नामावर थे कबूतर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 






*मुक्त-मुक्तक : 220 - क़ुराने पाक़................

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क़ुराने पाक़ ओगीता की क़सम खाकर मैं कहता हूँ ॥ जहाँ तक मुझसे बन पड़ता है मैं चुपचाप रहता हूँ ॥ मगर इक हद मुक़र्रर है मेरे भी सब्र की जायज़ , न औरों पर सितम ढाऊँ न ख़ुद पर ज़ुल्म सहता हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 219 - हारा नहीं हूँ.....................

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हारा नहीं हूँ चलते चलते थोड़ा रुक गया ॥ सुस्ता रहा हूँ ये न समझना कि चुक गया ॥ हैं बेक़रार मुझको तोड़ने जब आँधियाँ , मैं भी सलामती को अपनी थोड़ा झुक गया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 218 - वो यक़ीनन नहीं.............

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वो यक़ीनन नहीं दुश्मन वो यार होता है ॥ ऐसे चढ़कर के जो गर्दन सवार होता है ॥ आजकल इतनी बेतकल्लुफ़ी कहाँ दिखती , दोस्तों में न अबके इतना प्यार होता है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 217 - चार क़दम पर..............

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चार क़दम पर मंजिल हो तो पहुँचें पैदल से ॥ छोटी मोटी दूरी पार करें गर साइकल से ॥ पर्यावरण रहेगा बेहतर सेहत चुस्त-दुरुस्त , ’’ नजात मिल जाए क़िल्लते पेट्रोल डीज़ल से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 216 - न इक़दम ही नई...........

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न इकदम ही नई है और न बेहद ही पुरानी है ॥ किसी से क्या कहलवाएँ ख़ुद अपने मुँहज़बानी है ॥ बहुत मुश्किल से पाई और आसानी से जो खो दी , लम्हा भर की मोहब्बत की सदियों लंबी कहानी है ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 215 - इसके सिवा न...............

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इसके सिवा न और कोई पास था चारा ॥ तब तो लिया है एक खिलौने का सहारा ॥ दिल का गुबार और किस तरह निकालते , होता जो कान देके सुनने वाला हमारा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

90 - मुक्त-ग़ज़ल - शिकंजे यूं कसे..................

शिकंजे यूँ कसे थे मुझपे तिल भर हिल नहीं पाया ॥
हिला तो यों फटा ताउम्र कोई सिल नहीं पाया ॥ मुझे फेंका गया था सख़्त बंजर सी ज़मीनों पर , मैं फ़िर भी ऊग बैठा हूँ अगरचे खिल नहीं पाया ॥ उठाये अपने सर हाथी पहाड़ों से मैं फिरता हूँ , तुम्हारे हल्केपन का पंख सा चूज़ा न झिल पाया ॥ न हो हैरतज़दा चमड़ी मेरी है खाल गैंडे की , वगरना कौन मीलों तक घिसट कर छिल नहीं पाया ॥ मेरे हाथों में वो सब है न हूँ जिसका तमन्नाई , हुआ हूँ जबसे हसरत है वो सामाँ मिल नहीं पाया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 214 - अमावस को भी............

अमावस को भी मैं पूनम की 
उजली रात लिखता हूँ ॥ जो तोड़े न किसी का दिल 
मैं ऐसी बात लिखता हूँ ॥ समंदर के किनारे दूर तक 
मैं फैली रेती पर , हमेशा ही तुम्हारा नाम 
अपने साथ लिखता हूँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 213 - आहिस्ता-आहिस्ता औरत......

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आहिस्ता-आहिस्ता औरत निकलेगी पर्दों से ॥ उस दिन आगे-आगे होगी आगे के मर्दों से ॥
आजिज़ आ ठानेगी जिस दिन छुटकारा पाने की ,
जुल्म-सितम से , बंदिश से , लाचारी से , दर्दों से ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति