86 : मुक्त-ग़ज़ल - भलाई की है कि..............


भलाई की है कि इक अच्छी बुराई कर दी ॥
अलग था गेहूँ से उस घुन की पिसाई कर दी ॥
वो कर रहा था उसके साथ में ज़बर्दस्ती ,
हमने बदले में उसे उसकी लुगाई कर दी ॥
सिर्फ़ इक अफ़्वाह के तूफ़ान ने जमाने में ,
अपनी इज्ज़त जो हिमालय थी वो राई कर दी ॥
उधार लेके बनाने चले थे खीर ग़रीब ,
किसी अमीर ने उसमें भी खटाई कर दी ॥
खूँ के रिश्तों का था पहले लिहाज अदब अबके ,
ख़ता पे बाप की बच्चों ने पिटाई कर दी ॥
न माँगा दे के ग़ैर को तवील मुद्दत तक ,
हमने अपनी वो चीज़ ऐसे पराई कर दी ॥
हमने पिंजरे से परिंदे के भाग जाने पर ,
सज़ा के तौर पे पर काट रिहाई कर दी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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