जंगल का हो.................


जंगल का हो या शहर का 
राजा तो है राजा ,
जिसपे भी वो चाहेगा 
करेगा सवारियाँ ॥  
इस बात से क्या लेना उसे
 किसको क्या तक्लीफ़ ,
अपने भले को 
वो करेगा सब बुराइयाँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा

विवाह अभिनंदन पत्र

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म