84 : मुक्त-ग़ज़ल - जिसका डर था वही...............


जिसका डर था वही आज बात हो गई ॥
शब-ए-पूनम अमावस की रात हो गई ॥
दिल्लगी के लिए दिल लगाया जिधर ,
वो ही आख़िर शरीके हयात हो गई ॥
दोस्त ने दोस्त को गर दग़ा दे दिया ,
इसमें हैरानगी की क्या बात हो गई ॥
वो मेरा हाथ क्या छोडकर चल दिये ,
हर ख़ुशी भी मेरी उनके साथ हो गई ॥
सिर्फ़ हासिल है उनका बदन दिल नहीं ,
जीतकर भी उन्हे मेरी मात हो गई ॥
सिर्फ़ रोने से ऐ रोने वाले बता ,
किसकी दुश्वारियों से नजात हो गई ॥
लोग चलने लगे हँसते बतियाते अब ,
मेरी मैयत भी कोई बरात हो गई ॥
कोई बामन न अब शूद्र कोई रहा ,
अक्द से दोनों की एक जात हो गई ॥
(अक्द=शादी)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Sriram Roy said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति | शुभकामनायें

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