Tuesday, April 2, 2013

82 : ग़ज़ल - तुझपे अपने लुत्फ़ चुन-चुन


तुझपे अपने लुत्फ़ चुन-चुनकर लुटाऊँगा सभी ।।
तेरे ग़म सर पर अकेले ही उठाऊँँगा सभी ।।1।।
अपनी सूरत से बुरी सूरत नहींं देखी मगर ,
आईने हरगिज़ न दुनिया के हटाऊँँगा सभी ।।2।।
तूने कर ली ग़ैर से शादी न डर आशिक़ हूँ मैं ,
तेरी ख़्वाहिश है तो तेरे ख़त जलाऊँँगा सभी ।।3।।
हूँ बहुत दुश्नाम अब सरनाम होने के लिए ,
दाग़ माथे के मैं मिटकर भी मिटाऊँँगा सभी ।।4।।
छोड़ दे तू पूछना मैं वक़्त पर खुद ही तुझे ,
कुछ न छोडूँँगा वो बातें भी बताऊँँगा सभी ।।5।।
तूने माना है तहेदिल से मुझे उस्ताद तो ,
मैं भी जो कुछ जानता हूँ वो सिखाऊँँगा सभी ।।6।।
तू न बेजा फ़ायदा आज़ादियों का ले अगर ,
बंदिशें तुझ पर लगीं फ़ौरन हटाऊँँगा सभी ।।7।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

10 comments:

Sriram said...

so sweet and nice..........

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! sriram जी !

Unknown said...

बहुत सुन्दर अभिव्यति दी है प्रजापति जी ...बधाई

Unknown said...
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डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! bholanath navgeetkar जी !

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...
This comment has been removed by the author.
Guzarish said...

वाह खुबसूरत गजल

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! सरिता भाटिया जी !

शिव राज शर्मा said...

बेहतेरीन सर जी

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! Shiv Raj Sharma जी !

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