82 : मुक्त-ग़ज़ल - अब न रोऊंगा कभी..............


अब न रोऊंगा कभी न खिलखिलाऊंगा कभी ॥
दर्दो ग़म हो या ख़ुशी चुपचाप उठाऊंगा सभी ॥
अपनी सूरत से बुरी सूरत न देखी है मगर ,
आईने हरगिज़ न मैं घर के हटाऊंगा सभी ॥
 तूने कर ली ग़ैर से शादी न डर आशिक़ हूँ मैं ,
तेरी ख़्वाहिश है तो तेरे ख़त जलाऊंगा सभी ॥
हूँ बहुत दुश्नाम अब सरनाम होने के लिए ,
दाग़ माथे के मैं मिटकर भी मिटाऊंगा सभी ॥
छोड़ दे तू पूछना मैं वक़्त आने पर खुद ही ,
कुछ न छोडूंगा वो बातें भी बताऊंगा सभी ॥
तूने माना है तहेदिल से मुझे उस्ताद तो ,
मैं भी जो कुछ जानता हूँ वो सिखाऊंगा सभी ॥
तू न बेजा फ़ायदा आज़ादियों का ले अगर ,
बंदिशें तुझ पर लगीं फ़ौरन हटाऊंगा सभी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

sriram said…
so sweet and nice..........
बहुत सुन्दर अभिव्यति दी है प्रजापति जी ...बधाई
This comment has been removed by a blog administrator.
धन्यवाद ! bholanath navgeetkar जी !
वाह खुबसूरत गजल
धन्यवाद ! सरिता भाटिया जी !
Shiv Raj Sharma said…
बेहतेरीन सर जी
धन्यवाद ! Shiv Raj Sharma जी !

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