81 : मुक्त-ग़ज़ल - रोज़ ये नाज़.....................


रोज़ ये नाज़ उठाऊँ तो उठाऊँ कैसे ?
फ़िर वो रूठे हैं मनाऊँ तो मनाऊँ कैसे ?
यूँ तो कितने ही ग़म हैं दफ़्न मेरे सीने में ,
प्यार का दर्द छिपाऊँ तो छिपाऊँ कैसे ?
यूँ ही कर लो यकीं मेरी मोहब्बत का सनम ,
चीरकर दिल को दिखाऊँ तो दिखाऊँ कैसे ?
ज़िंदगी सख़्त हक़ीक़त है नर्म ख़्वाब नहीं ,
इसको अफ़साना बनाऊँ तो बनाऊँ कैसे ?
साफ़ इशारों की ज़ुबाँ भी जो न समझे उसको ,
तोतलाहट भरी आवाज़ लगाऊँ कैसे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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