85 : मुक्त-ग़ज़ल - ग़मी में एक दिन.............

ग़मी में एक दिन खुशियाँ मनाने का चलन होगा ॥
उजालों के लिए शम्मा बुझाने का चलन होगा ॥
किया करते हैं हम जिस तरह से बर्बाद पानी को ,
कि इक दिन इक महीने में नहाने का चलन होगा ॥
यूँ ही मरती रहीं गर पेट में ही लड़कियाँ इक दिन ,
कई लड़कों से इक लड़की बिहाने का चलन होगा ॥
इसी तादाद में खाता रहा गर जानवर इंसाँ ,
किसी दिन आदमी के गोश्त खाने का चलन होगा ॥
जो रातों रात दौलत मंद अगर सब बनना चाहेंगे ,
तो नंबर दो से ही पैसा कमाने का चलन होगा ॥
तरक़्क़ी में अगर आड़े ज़मीर आता रहा यूँ ही ,
तो इस बेदार रोड़े को सुलाने का चलन होगा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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