Tuesday, April 30, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 187 - सचमुच विनम्रता..............


सचमुच 
विनम्रता तो जैसे खो गई ॥
अहमण्यता 
प्रधान सबमें हो गई ॥
दिन रात हम में 
स्वार्थ जागता गया ,
परहित की भावना
 दुबक के सो गई ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...