मुक्तक :185 - अब न ताक़त....................


अब न ताक़त न वो चुस्ती 
न फुर्ती यार रही ॥
उम्रे बावन में 
अठारह की न रफ़्तार रही ॥
जिसने काटा था सलाख़ों को
 लकड़ियों की तरह ,
वो मेरे जिस्म की 
तलवार में न धार रही ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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