*मुक्त-मुक्तक : 181 - हंस के सिर..................


हँस के सिर आँखों पे 
उठाई ही क्यों जाती है ?
जब बुरी है तो फ़िर 
बनाई ही क्यों जाती है ?
इतनी नापाक़ है 
गंदी है फ़िर बताओ शराब ,
पीयी जाती है और
 पिलाई ही क्यों जाती है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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