*मुक्त-मुक्तक : 180 - क्यों रहते हो.................


क्यों रहते हो तुम ग़ुस्से में भरे भरे अक्सर ?
क्यों बयान देते फिरते हो खरे खरे अक्सर ?
क्या तुम नहीं जानते सच के पुतले बड़े बड़े ,
फूँक दिये झूठों ने मिलकर खड़े खड़े अक्सर ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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