*मुक्त-मुक्तक : 179 - लाख खूँ ख़्वार............

लाख खूँ ख़्वार हो शैतान हो वली समझे ॥
दोस्त वो है जो अपने दोस्त को सही समझे ॥
दोस्त का चिथड़ा चिथड़ा दूध भी तहे दिल से ,
रबड़ी छैना बिरज का मथुरा का दही समझे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Digamber Naswa said…
waah ... kamaal ka muktak ...
Sudhir Singh said…
आपकी कवितायेँ अच्छी लगीं , बलात्कारी की आत्मकथा काफी अच्छी लगी इसे और विस्तार मिलाता तो और भी अच्छा होता .
सुधीर सिंह , राष्ट्रीय संयोजक , मंजिल ग्रुप सहय्तिक मंच , भारतवर्ष ,मो-९८६८२१६९५७
धन्यवाद । दिगंबर नासवा जी ।
धन्यवाद । सुधीर सिंह जी ।

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