*मुक्त-मुक्तक : 171 - पैर से सिर तक............


पैर से सिर तक तू केवल
 कामिनी का सौंदर्य ॥
इस भरे यौवन में भी 
संन्यासियों सा ब्रह्मचर्य ॥
इक विकट चुंबक तू 
मैं सुई पिन सरीखा लोहखण्ड ,
क्यों न खिंचता जाऊँ बरबस 
करने को मैं साहचर्य ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Shiv Raj Sharma said…
अच्छा है सर
धन्यवाद ! Shiv Raj Sharma जी !

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