*मुक्त-मुक्तक : 168 - मैंने तेरी नाचती.............


मैंने तेरी नाचती 
तस्वीर देखी है ॥
दिल में सर ऊँचा उठाती
 पीर देखी है ॥
वन में जैसे क़ैस ने 
देखा हो लैला को ,
राँझना ने मानो मरु में 
हीर देखी है ॥
( क़ैस=मजनूँ , मरु=रेगिस्तान )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Pratibha Verma said…
बिलकुल सही कहा आपने ...
पधारें बेटियाँ ...
धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

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