*मुक्त-मुक्तक : 167 - रात-रात भर................


रात-रात भर जाग जाग कर 
यों मत भोर तू कर ॥
निर्निमेष मत अपनी दृष्टि 
आकाश ओर तू कर ॥
प्रीत सत्य और अति पुनीत है
 निःसन्देह तेरी ,
व्यर्थ परिश्रम चंद्र प्राप्ति का
 मत चकोर तू कर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

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