Tuesday, April 16, 2013

*मुक्त-मुक्तक ; 162 - स्वयं को सिंह...............


स्वयं को सिंह उनको मृगछौना बनाने के लिए ॥
ख़ुद को बोतल उनको अधपौना बनाने के लिए ॥
उनको गड्ढे में गिराने का न कर कुत्सित जतन ,
आस्माँ बन जा उन्हें बौना बनाने के लिए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...