*मुक्त-मुक्तक : 161 - एहसास मर चुके............


एहसास मर चुके हैं मेरे अब तो इस क़दर ॥
बर्फ़ीली हवाओं का न अब लू का हो असर ॥
लगता नहीं किसी भी जगह उसके बिना दिल ,
जंगल हों मरुस्थल हों कि न्यूयार्क से शहर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर....बेहतरीन प्रस्तुति
पधारें "आँसुओं के मोती"
धन्यवाद ! Pratibh Verma जी !

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