*मुक्त-मुक्तक : 160 - कंकड़ भी मुझे ................


कंकड़ भी मुझे दुःख के लगें 
ठस पहाड़ से ॥
सुख तिल समान लगते हैं 
चाहे हों ताड़ से ॥
सुख का तो समझ आता है 
हँसकर के उठाना ,
तुम कैसे उठा लेते हो दुःख
 प्यार-लाड़ से ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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धन्यवाद ! अभिषेक कुमार झा अभी जी !

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