*मुक्त-मुक्तक : 155 - नर्म डंठल की...............


नर्म डंठल की जगह सख़्त तना हो जाना ॥
बिखरे बिखरे से चाहता था घना हो जाना ॥
कोशिशों में तो कसर कुछ न उठा रक्खी थी ,
पर था क़िस्मत में हर इक हाँ का मना हो जाना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर....
पधारें "आँसुओं के मोती"
धन्यवाद ! Pratibha Verma जी !

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