Friday, April 12, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 153 - ये शहर क्या है................


ये शहर क्या है दुनिया को
कर डालूँ फ़तह मैं ॥
इक बार फ़क़त दिल में 
तेरे पालूँ जगह मैं ॥
बन जाऊँ तेरा जिन्न 
तुझको आक़ा बना लूँ ,
हर हुक़्म की तामील 
करूँ ठीक तरह मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

2 comments:

ANULATA RAJ NAIR said...

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ....
सादर
अनु

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

धन्यवाद ! expression अनुलता जी !

मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...