*मुक्त-मुक्तक : 145 - चट्टानों से दिखते..............



चट्टानों से दिखते हो पर हो राखड़ ॥
तुम सूरज से डरने वाले चमगादड़ ॥
बनते हो रहनुमा फ़रिश्ता और ख़ुदा ,
ऊपर प्रेमिल अंदर से मुक्का झापड़ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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