*मुक्त-मुक्तक : 144 - जितनी क़ाबिलियत.........


जितनी क़ाबिलियत मेरी घटती गई ॥
हक़ की उतनी ही तलब बढ़ती गई ॥
जबसे दिखना हो गया कम आँख को ,
ताकने की और लत लगती गई ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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