*मुक्त-मुक्तक : 140 - सब रेग्ज़ार.....................


सब रेग्ज़ार बूँद बूँद को तरस रहे ॥
बादल समंदरों पे झमाझम बरस रहे ॥
गंजों को कंघे अंधों को चश्मों को बाँटने ,
ये देख मुख़य्यर भी कमर अपनी कस रहे ॥
(मुख़य्यर=दानवीर)
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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