Friday, April 5, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 137 - है अभी भी........................


है अभी भी अपना पर 
अपना नहीं लगता ॥
जाने क्यों अब अपना घर 
अपना नहीं लगता ॥
जिसमें मैं पैदा हुआ 
जिसमें गुज़ारी ज़िंद ,
अब वही प्यारा शहर 
अपना नहीं लगता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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मुक्तक : 941 - बेवड़ा

लोग चलते रहे , दौड़ते भी रहे ,  कोई उड़ता रहा , मैं खड़ा रह गया ।। बाद जाने के तेरे मैं ऐसी जगह ,  जो गिरा तो पड़ा का पड़ा रह गया ।...