*मुक्त-मुक्तक :136 - हैरत अंगेज़.................

                       हैरत अंगेज़ ज़बरदस्त खुलासा होते ॥                       
हमने देखा है उधर रोज़ तमाशा होते ॥
तिल को देखा है ताड़ जैसा ऊँचा उठते हुए ,
पर्वतों को सिकुड़ रवे सा ज़रा सा होते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Shiv Raj Sharma said…
क्या बात है सर जी । सुंदर
Shiv Raj Sharma said…
क्या बात है सर जी । सुंदर
धन्यवाद ! Shiv Raj Sharma जी !

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