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Showing posts from April, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 187 - सचमुच विनम्रता..............

सचमुच 
विनम्रता तो जैसे खो गई ॥ अहमण्यता 
प्रधान सबमें हो गई ॥ दिन रात हम में 
स्वार्थ जागता गया , परहित की भावना
 दुबक के सो गई ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक :186 - टोपी बंडी कुर्ता.............

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टोपी बंडी कुर्ता क्या है पाजामें फटवा दूँगा ॥ संसद से हर गली सड़क तक हंगामें मचवा दूँगा ॥ मैं मतदाता हूँ विवेक से वोट अगर देने चल दूँ , कितने ही कुर्सी सिंहासन उलट पलट करवा दूँगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

मुक्तक :185 - अब न ताक़त....................

अब न ताक़त न वो चुस्ती 
न फुर्ती यार रही ॥ उम्रे बावन में 
अठारह की न रफ़्तार रही ॥ जिसने काटा था सलाख़ों को
 लकड़ियों की तरह , वो मेरे जिस्म की 
तलवार में न धार रही ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

तुम मुझे चाहे मत...............

तुम मुझे 
चाहे मत कभी मिलना , पर मुझे 
चाहना न तजना तुम ॥ तुम मेरा नाम 
किसी सूरत में , भूलना मत 
भले न भजना तुम ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 184 - अपने ख़स्ता..........

अपने ख़स्ता हाल पे 
औरों के धन से चिढ़ हो ॥ देख देख अपना बूढ़ापन 
यौवन से चिढ़ हो ॥ और यही मन 
और भी दुःख देता है जब अपना , रोग असाध्य हो 
तो स्वस्थों के जीवन से चिढ़ हो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

जंगल का हो.................

जंगल का हो या शहर का 
राजा तो है राजा , जिसपे भी वो चाहेगा 
करेगा सवारियाँ ॥   इस बात से क्या लेना उसे
 किसको क्या तक्लीफ़ , अपने भले को 
वो करेगा सब बुराइयाँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

महँगाई यूँ तो................

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महँगाई यूँ तो डालती है
 हर दफ़ा ही फ़र्क ॥ इस बार मगर डर है 
हो न जाये बेड़ा गर्क ॥ गिर जाये मुँह के बल 
न ये सरकार देखना , महँगाई के ही पक्ष में
 देती रही जो तर्क ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

बूढ़ा जवान बच्चा.................

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बूढ़ा, जवान, बच्चा, बीमार या सेहतमंद ,
आ जाये जिसकी कुछ हो बचता न बचाने से ॥ जिसके भी जनाज़े में जुटती हो भीड़ भारी , वो शख़्स अलहदा ही होता है जमाने से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 182 - जिन्हें सपनों में.............

जिन्हें सपनों में भी न पा सकें 
उन पर ही मरते हैं ॥ न जाने कैसी कैसी 
कल्पनाएँ लोग करते हैं ? चकोरों को किसी सूरत में 
चन्दा मिल नहीं सकता , बख़ूबी जानते हैं फ़िर भी 
अपलक उसको तकते हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 181 - हंस के सिर..................

हँस के सिर आँखों पे 
उठाई ही क्यों जाती है ? जब बुरी है तो फ़िर 
बनाई ही क्यों जाती है ? इतनी नापाक़ है 
गंदी है फ़िर बताओ शराब , पीयी जाती है और
 पिलाई ही क्यों जाती है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

कभी न छपने.............

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कभी न छपने वाला  लेकिन बड़ा लिखइया ॥ कभी न जीतने वाला 
लेकिन बड़ा लड़इया ॥ सिर्फ़ तैरना मेरे वश 
या खेना नैया , पार लगाने वाला 
गीता ज्ञान रचइया  ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

उठकर ज्यों है.....................

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उठकर ज्यों है आदत 
मंजन करने की ॥ रोज़ नहाने – धोने 
भोजन करने की ॥ टाइम – पास नहीं मेरा 
कविता करना ॥ राधा – मीरा का 
श्रीकृष्ण पे है मरना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

हो कितनी खूबसूरत.................

हो कितनी ख़ूबसूरत 
जस परी या अप्सरा ॥ न पा पाती है 
बीवी का तवायफ़ ओहदा ॥ ज़माना इनके मानी में
 करे कुछ फ़र्क़ यों , कि  इक मस्जिद हो जैसे 
दूसरी हो मैक़दा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 180 - क्यों रहते हो.................

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क्यों रहते हो तुम ग़ुस्से में भरे भरे अक्सर ? क्यों बयान देते फिरते हो खरे खरे अक्सर ? क्या तुम नहीं जानते सच के पुतले बड़े बड़े , फूँक दिये झूठों ने मिलकर खड़े खड़े अक्सर ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 179 - लाख खूँ ख़्वार............

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लाख खूँ ख़्वार हो शैतान हो वली समझे ॥ दोस्त वो है जो अपने दोस्त को सही समझे ॥ दोस्त का चिथड़ा चिथड़ा दूध भी तहे दिल से , रबड़ी छैना बिरज का मथुरा का दही समझे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 178 - पेटू को तीखी.............

पेटू को तीखी चटनी औ’
अचार का चस्का ॥ अक्सर ही डॉक्टर को हो
 बीमार का चस्का ॥ जैसे कि जुआरी को 
जुआ खेलने की लत , दिन रात मुझको है तेरे 
दीदार का चस्का ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 177 - उत्कृष्टता पर................

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उत्कृष्टता पर देखिये निकृष्ट लिखते हैं ॥ निकृष्ट को हर समय अति उत्कृष्ट लिखते हैं ॥ दुष्ट को लिखते मसीहा साधु को शैतान , धुर अनावश्यक को पल पल इष्ट लिखते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

87 : मुक्त-ग़ज़ल - या रब ये तूने.................

या रब ये तूने हमको किस रंग में रँग डाला ? कौए भी चिढ़ाते हैं कह कह के काला काला ॥ जब कारसाज़ हमने तुझको कभी न पाया , क्या फ़ायदे की मस्जिद किस काम का शिवाला ? हमको यूँ ही न समझो बेकार में शराबी , ग़म या ख़ुशी न हो तो छूते नहीं पियाला ॥ जलती है आग दोनों के पेट में बराबर , इस मुँह से छीनकर उस मुँह में न दो निवाला ॥ तमगों को रखके कोई देता नहीं उधारी , अबके तुम हमको देना इनआम नक़्द वाला ॥ दरवेश कब से दर पे दरवेश के खड़ा है , कासा बजाता गाता इक गीत दर्द वाला ॥ यूँ उसने हमें अपने दिल से किया है ख़ारिज , जैसे मवाद अपने फोड़े का है निकाला ॥ इनके तो मुआफ़िक़ है उनके भी मुताबिक़ है , इक हम हैं इश्क़ जिसको आए न रास साला ॥ चेहरा न ढाँपना तुम कुछ ढूँढ मैं रहा हूँ , इस बोगदे में चिनगी भर भी नहीं उजाला ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 176 - मेरी जो मोहब्बत............

मेरी जो मोहब्बत का है  क़िस्सा यों समझ ले ॥  होते ही पैदा मर गया  बच्चा यों समझ ले ॥  ताउम्र रहा  मुब्तलाए इश्क़ जबकि हाँ , खाता रहा पै दर पै मैं  गच्चा यों समझ ले ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

स्वप्न सुसज्जित................

स्वप्न-सुसज्जित 
झूठी कभी न जगती पर ॥ जीना है मुझको 
यथार्थ की धरती पर ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति  

क्या क्या अजीब.....................

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क्या क्या अजीब शौक़ लोग पाल कर चलें ? पैरों में टोप सिर में जूते डाल कर चलें ! -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक :175 - है हक़ीक़त में..............

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है हक़ीक़त में ज़िंदगानी क्या ? सिर्फ़ इक बुलबुला है पानी का ॥ फ़िर भी कितनों को है ग़ुरूर यहाँ , दौलतो-शोहरतो-जवानी का ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

व्यर्थ है सच व्यर्थ है.............

व्यर्थ है सच व्यर्थ है........
जीवन अगर यह नर्क है ? आत्महत्या के लिए 
इससे बड़ा क्या तर्क है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

ज़िंदगी उसकी अगर..........

ज़िंदगी  
उसकी अगर रंगीन है , इंतिज़ारे मर्ग 
क्यों उसको रहे ? चश्मा-ए-शाही 
जिसे कहते हैं सब, फ़िर वो रेगिस्तान 
ख़ुद को क्यों कहे ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति  

86 : मुक्त-ग़ज़ल - भलाई की है कि..............

भलाई की है कि इक अच्छी बुराई कर दी ॥ अलग था गेहूँ से उस घुन की पिसाई कर दी ॥ वो कर रहा था उसके साथ में ज़बर्दस्ती , हमने बदले में उसे उसकी लुगाई कर दी ॥ सिर्फ़ इक अफ़्वाह के तूफ़ान ने जमाने में , अपनी इज्ज़त जो हिमालय थी वो राई कर दी ॥ उधार लेके बनाने चले थे खीर ग़रीब , किसी अमीर ने उसमें भी खटाई कर दी ॥ खूँ के रिश्तों का था पहले लिहाज अदब अबके , ख़ता पे बाप की बच्चों ने पिटाई कर दी ॥ न माँगा दे के ग़ैर को तवील मुद्दत तक , हमने अपनी वो चीज़ ऐसे पराई कर दी ॥ हमने पिंजरे से परिंदे के भाग जाने पर , सज़ा के तौर पे पर काट रिहाई कर दी ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 174 - बाहर हैं जो.............

बाहर हैं जो जेलों में
 गिरफ़्तार नहीं हैं ॥ मतलब नहीं इसका वो
 गुनहगार नहीं हैं ॥ साबित न जिनके ज़ुर्म 
अदालत में हो सके , क्या ऐसे ख़ताकार
 ख़ताकार नहीं हैं ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 173 - ट्रेन की भीड़..................

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ट्रेन की भीड़-भाड़ में धँसे गसा-पस में ॥
होके बेखौफ़ ज़माने से टैक्सी बस में ॥ आप क्या जानिए कि ऐसे भी , बनते हैं आशिक़ो महबूब ख़ूब आपस में ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 172 - आव देखा न ताव............

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आव देखा न ताव उनका झट चुनाव किया ॥ बाद मुद्दत के मगर प्रेम का प्रस्ताव किया ॥ तब तलक उनके कहीं और लड़ चुके थे नयन , अपना ख़त ख़ुद ही फाड़ राह में फैलाव किया ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति