*मुक्त-मुक्तक : 97 - कर लूँगा हँस के...............



कर लूँगा हँस के तै मैं 
हर तरह के रास्ते ॥
मैं सोचता था
 जबकि तुम थे मेरे वास्ते ॥
अब जबकि मैं रहा न तुम्हारा
 अज़ीज़ो ख़ास ,
दो डग भी मुझको
 दो हज़ार मील भासते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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