*मुक्त-मुक्तक ; 93 - दुनिया से झगड़ूँ.........


दुनिया से झगड़ूँ लेकिन 
कब उससे लड़ता हूँ ॥
फ़िर भी उसकी आँख में 
कंकड़ जैसा गड़ता हूँ ॥
उसकी रह में फूलों सा मैं 
बिछा बिछा रहता ,
उसको शक़ मैं 
बार बार रोड़ो सा अड़ता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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