*मुक्त-मुक्तक : 92 - फर्ज़ का निर्वाह................


फर्ज़ का निर्वाह ही 
कर धर रहे हैं ॥
हक़ कहाँ अपना तलब 
हम कर रहे हैं ॥
है यकीं कि है यही 
इक राहे आख़िर ,
इसलिए जीने की ख़ातिर 
मर रहे हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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