*मुक्त-मुक्तक : 87 - मेरे सूरज का..............


मेरे सूरज का सारा ही 
उजाला तम से ढक डाला ॥
मेरी इज्ज़त का झीना 
फाड़ जो जबरन वरक डाला ॥
भला किस मुँह से अपने 
देव को अब मैं करूँ अर्पित ,
चढ़ाने से ही पहले 
तुमने उसका भोग चख डाला ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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