*मुक्त-मुक्तक : 85 - कंघी कर कर................



कंघी कर कर ज़ुल्फों वाला गंजा हो बैठा ॥
तक तक चम चम आँखों वाला अंधा हो बैठा ॥
सूरज बनने की चाहत में ख़ुद को आग लगा ,
बेचारा जुगनूँ बर्फ़ानी ठंडा हो बैठा ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 


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