*मुक्त-मुक्तक :84 - अब वो अपने............


अब वो अपने मध्य 
रहा न आकर्षण ॥
नहीं स्निग्धता बची 
खुरदुरा है घर्षण ॥
शत्रु बने इससे पहले
 हम क्यों न करें ,
अपनी व्यर्थ मित्रता का 
साशय तर्पण ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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