*मुक्त-मुक्तक : 83 - चटाई को ही गद्दा.............


चटाई को ही गद्दा 
तौलिया चादर समझते हैं ॥
जो नींद आ जाए तो धरती
पलँग-बिस्तर समझते हैं ॥
ख़ुशी में बोलते बगुले को भी 
हम हंस बिन हिचके ,
रहें नाराज़ तो रेशम को भी 
खद्दर समझते हैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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