*मुक्त-मुक्तक : 81 - कितनी भी हो..............


कितनी भी हो तक्लीफ़ 
मगर तू न बिलबिला ॥
दिल लाख अश्क़बार सही 
फिर भी खिलखिला ॥
दुनिया को नापसंद हैं 
रोनी सी सूरतें ,
ताज़िंदगी लबों पे रख 
हँसी का सिलसिला ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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