78 : मुक्त-ग़ज़ल - सफ़ेदी को कौओं.............


सफ़ेदी को कौओं में तू ढूँढता है ॥
तू पागल नहीं है तो फ़िर और क्या है ?
कि तूफ़ान हैं आंधियाँ हैं लचक जा ,
यों क्यों टूट जाने उखड़ने खड़ा है ?
यों पथराई आँखों में क्या झाँकता है ,
वही ख़्वाब तब भी था अब भी बसा है ॥
ये सब ऐशोआराम का साज़ोसामाँ ,
तुझे खो के लगता है बेकार का है ॥
तू फ़िर ज़ोर कितना ही अपना लगा ले ,
न नज़रों में गिर कर कोई उठ सका है ॥
कि करना ही होगा इलाज अब तो हीरा
जो अब सर से पानी गुजरने लगा है ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

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