72 : मुक्त-ग़ज़ल - तेरा कोई भी..................


तेरा कोई भी ख़त जला न सका हूँ ॥
तुझे भूलकर भी भुला न सका हूँ ॥
नहीं बेवफ़ा पर नहीं झूठ ये भी ,
मैं कोई भी वादा निभा न सका हूँ ॥
मैं शर्मिंदा इतना मेरे काम से हूँ ,
अभी भी झुका सर उठा न सका हूँ ॥
ज़माना करे चाँद सूरज की बातें ,
ज़मीं से मैं पीछा छुड़ा न सका हूँ ॥
मैं वाइस हूँ सब तेरे तक्लीफ़ो ग़म का ,
मगर ख़ुद को तोहमत लगा न सका हूँ ॥
मैं अश्कों को पीने में माहिर नहीं हूँ ,
मैं सदमे से आँसू गिरा न सका हूँ ॥
चले आओ तुम चार काँधों को लेकर ,
मैं हस्ती को अब के बचा न सका हूँ ॥
बहुत चाहता था जो तू चाहता था ,
मगर बन के मैं वो दिखा न सका हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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